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भीष्म पर्व
अध्याय ७५
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सञ्जय़ उवाच
तथा तस्मिन्वर्तमाने दुष्कर्णो भ्रातुरन्तिके |  ४३   क
चिच्छेद समरे चापं नाकुलेः क्रोधमूर्छितः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति