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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
नावो न सन्ति सेनाय़ा वह्व्यस्तारय़ितुं तथा |  २८   क
वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति