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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
आय़ाहि पश्याद्य युय़ुत्समानं; मां सूतपुत्रं च वृतौ जय़ाय़ |  ११   क
षट्साहस्रा भारत राजपुत्राः; स्वर्गाय़ लोकाय़ रथा निमग्नाः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति