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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
सागरस्तु ततः स्वप्ने दर्शय़ामास राघवम् |  ३३   क
देवो नदनदीभर्ता श्रीमान्यादोगणैर्वृतः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति