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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
यद्येवं याचतो मार्गं न प्रदास्यति मे भवान् |  ३७   क
शरैस्त्वां शोषय़िष्यामि दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति