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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अस्ति त्वत्र नलो नाम वानरः शिल्पिसंमतः |  ४१   क
त्वष्टुर्देवस्य तनय़ो वलवान्विश्वकर्मणः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति