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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
नलसेतुरिति ख्यातो योऽद्यापि प्रथितो भुवि |  ४५   क
रामस्याज्ञां पुरस्कृत्य धार्यते गिरिसंनिभः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति