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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वराक्षसराज्ये चाप्यभ्यषिञ्चद्विभीषणम् |  ४९   क
चक्रे च मन्त्रानुचरं सुहृदं लक्ष्मणस्य च ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति