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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
गन्धमादनवासी तु प्रथितो गन्धमादनः |  ५   क
कोटीसहस्रमुग्राणां हरीणां समकर्षत ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति