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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततो गत्वा समासाद्य लङ्कोद्यानान्यनेकशः |  ५१   क
भेदय़ामास कपिभिर्महान्ति च वहूनि च ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति