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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्रास्तां रावणामात्यौ राक्षसौ शुकसारणौ |  ५२   क
चारौ वानररूपेण तौ जग्राह विभीषणः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति