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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रीमान्दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽपि वीर्यवान् |  ७   क
प्रचकर्ष महत्सैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति