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शान्ति पर्व
अध्याय २६८
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भीष्म उवाच
यथैव शृङ्गं गोः काले वर्धमानस्य वर्धते |  ७   क
तथैव तृष्णा वित्तेन वर्धमानेन वर्धते ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति