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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
हन्तास्मि त्वां सहामात्यं युध्यस्व पुरुषो भव |  १५   क
पश्य मे धनुषो वीर्यं मानुषस्य निशाचर ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति