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वन पर्व
अध्याय २७२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः |  २५   क
स भृशं ताडय़न्वीरो रावणिर्माय़यावृतः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति