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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
इङ्गितज्ञास्ततो भर्तुश्चत्वारो रजनीचराः |  १८   क
चतुर्ष्वङ्गेषु जगृहुः शार्दूलमिव पक्षिणः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति