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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
तांस्तथाङ्गेषु संसक्तानङ्गदो रजनीचरान् |  १९   क
आदाय़ैव खमुत्पत्य प्रासादतलमाविशत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति