द्रोण पर्व  अध्याय ८५

सञ्जय़ उवाच

तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव |  ९७   क
वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ||  ९७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति