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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
वेगेनोत्पततस्तस्य पेतुस्ते रजनीचराः |  २०   क
भुवि सम्भिन्नहृदय़ाः प्रहारपरिपीडिताः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति