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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
उत्पतद्भिः पतद्भिश्च निपतद्भिश्च वानरैः |  २६   क
नादृश्यत तदा सूर्यो रजसा नाशितप्रभः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति