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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राकारं ददृशुस्ते तु समन्तात्कपिलीकृतम् |  २८   क
राक्षसा विस्मिता राजन्सस्त्रीवृद्धाः समन्ततः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति