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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
प्रजापतिस्तत्ससृजे तपसोऽन्ते महातपाः |  ५   क
शङ्करस्त्वसृजत्तात प्रजाः स्थावरजङ्गमाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति