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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
रामस्तु शरजालानि ववर्ष जलदो यथा |  ३८   क
तानि लङ्कां समासाद्य जघ्नुस्तान्रजनीचरान् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति