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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
मुसलालातनाराचतोमरासिपरश्वधैः |  ५   क
अन्विताश्च शतघ्नीभिः समधूच्छिष्टमुद्गराः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति