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वन पर्व
अध्याय २६८
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मार्कण्डेय़ उवाच
अङ्गदस्त्वथ लङ्काय़ा द्वारदेशमुपागतः |  ७   क
विदितो राक्षसेन्द्रस्य प्रविवेश गतव्यथः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति