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शान्ति पर्व
अध्याय २६९
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भीष्म उवाच
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित् |  १८   क
अज्ञातलिप्सां लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति