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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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शौनक उवाच
सोऽहं न केनचिच्चार्थी त्वां च धर्ममुपाह्वय़े |  १८   क
क्रोशतां सर्वभूतानामहो धिगिति कुर्वताम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति