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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
निर्मुक्तसर्पप्रतिमैश्च तीक्ष्णै; स्तैलप्रधौतैः खगपत्रवाजैः |  ३३   क
षष्ट्या नाराचैर्वासुदेवं विभेद; तदन्तरं सोमकाः प्राद्रवन्त ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति