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वन पर्व
अध्याय २६९
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मार्कण्डेय़ उवाच
अमृष्यमाणः सवलो रावणो निर्ययावथ |  ५   क
व्यूह्य चौशनसं व्यूहं हरीन्सर्वानहारय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति