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अनुशासन पर्व
अध्याय १०६
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भगीरथ उवाच
निःशङ्कमन्नमददं व्राह्मणेभ्यः; शतं सहस्राणि सदैव दानम् |  ८   क
व्राह्मं व्रतं नित्यमास्थाय़ विद्धि; न त्वेवाहं तस्य फलादिहागाम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति