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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
मूर्तिमत्यश्च सरितो वेदाश्चैव सनातनाः |  ११   क
समुद्राश्च ह्रदाश्चैव तीर्थानि विविधानि च |  ११   ख
पृथिवी द्यौर्दिशश्चैव पादपाश्च जनाधिप ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति