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स्त्री पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
कुरुध्वमुदकं तस्य भ्रातुरक्लिष्टकर्मणः |  ११   क
स हि वः पूर्वजो भ्राता भास्करान्मय़्यजाय़त |  ११   ख
कुण्डली कवची शूरो दिवाकरसमप्रभः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति