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स्त्री पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
नान्यः कुन्तीसुतात्कर्णादगृह्णाद्रथिनां रथी |  १६   क
स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः |  १६   ख
असूत तं भवत्यग्रे कथमद्भुतविक्रमम् ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति