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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै |  ३९   क
नैतन्मे प्रिय़मित्येव स मां प्रीतोऽव्रवीत्तदा |  ३९   ख
इत्युक्तोऽहं शरीरं स्वमपश्यं श्रीसमाय़ुतम् ||  ३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति