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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
एष मूलं ह्यनर्थानां दुर्योधनमते स्थितः |  १५   क
हतैनमिति जल्पन्तः क्षत्रिय़ाः समुपाद्रवन् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति