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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
तपसा व्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः |  २६   क
गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति