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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्ध्ना विभर्ति यः |  ५४   क
विभर्ति रूपं सोऽर्कस्य तमोनाशात्सुनिर्मलम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति