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शान्ति पर्व
अध्याय २७५
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समङ्ग उवाच
यस्मै प्रज्ञां कथय़न्ते मनुष्याः; प्रज्ञामूलो हीन्द्रिय़ाणां प्रसादः |  ११   क
मुह्यन्ति शोचन्ति यदेन्द्रिय़ाणि; प्रज्ञालाभो नास्ति मूढेन्द्रिय़स्य ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति