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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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सञ्जय़ उवाच
एतदर्थं हि हैडिम्व पुत्रानिच्छन्ति मानवाः |  ४८   क
कथं नस्तारय़ेद्दुःखात्स त्वं तारय़ वान्धवान् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति