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वन पर्व
अध्याय २२६
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वैशम्पाय़न उवाच
महाभिजनसम्पन्नं भद्रे महति संस्थितम् |  १५   क
पाण्डवास्त्वाभिवीक्षन्तां यय़ातिमिव नाहुषम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति