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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य; स्तस्मै प्रय़च्छन्ति सुखानि देवाः |  ८४   क
तद्भाविताः स्पर्शने दर्शने य; स्तस्मै देवा गतिमिष्टां दिशन्ति ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति