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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
सुतावनीध्रस्य हरस्य भार्या; दिवो भुवश्चापि कक्ष्यानुरूपा |  ८८   क
भव्या पृथिव्या भाविनी भाति राज; न्गङ्गा लोकानां पुण्यदा वै त्रय़ाणाम् ||  ८८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति