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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
लोकानिमान्नय़ति या जननीव पुत्रा; न्सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्ना |  ९३   क
स्वस्थानमिष्टमिह व्राह्ममभीप्समानै; र्गङ्गा सदैवात्मवशैरुपास्या ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति