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वन पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेष चरन्पार्थ कालचक्रमतन्द्रितः |  ३५   क
प्रकर्षन्सर्वभूतानि सविता परिवर्तते ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति