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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
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व्राह्मण उवाच
सप्त स्त्रिय़स्तत्र वसन्ति सद्यो; अवाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः |  १८   क
ऊर्ध्वं रसानां ददते प्रजाभ्यः; सर्वान्यथा सर्वमनित्यतां च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति