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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
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व्राह्मण्यु उवाच
क्व तद्वनं महाप्राज्ञ के वृक्षाः सरितश्च काः |  ३   क
गिरय़ः पर्वताश्चैव किय़त्यध्वनि तद्वनम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति