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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम् |  १३   क
स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा यन्मां त्वं परिपृच्छसि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति