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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
तं दृष्ट्वा लोकपालास्ते भ्राजमानं यथा रविम् |  २७   क
तस्थुर्विगतसङ्कल्पा विस्मिता रूपसम्पदा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति