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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम् |  ८   क
दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति