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द्रोण पर्व
अध्याय ७२
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सञ्जय़ उवाच
ते हय़ा साध्वशोभन्त विमिश्रा वातरंहसः |  २२   क
पारावतसवर्णाश्च रक्तशोणाश्च संय़ुगे |  २२   ख
हय़ाः शुशुभिरे राजन्मेघा इव सविद्युतः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति