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वन पर्व
अध्याय २४३
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य चिन्तापरीतस्य वुद्धिर्जज्ञे महात्मनः |  २१   क
वहुव्यालमृगाकीर्णं त्यक्तुं द्वैतवनं वनम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति